Thursday, December 8, 2011


हीरा डोम ने १०० वर्ष पहले भोजपुरी में कविता लिखी में कोशिश करूँगा हिंदी में थोडा समझ कर लिखने की क्यों की मुझे भोज पुरी नहीं आती लेकिन हीरा डोम के लिखे एक-एक शब्द आज भी प्रासंगिक हैं भगवान, समाज, व्यवस्था व सरकार से कईल गईल भोजपुरी में उन्कर शिकायत के आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ‘अछूत की शिकायत’ नाम से कविता के रूप में ‘‘सरस्वती’’ के सितम्बर,1914 के अंक में प्रकाशित कईलन
हमनी के राति दिन दुःखवा भोगत बानी=हम ही रात दिन दुःख भोगते हैं

हमनी के सहेब से मिली सुनाइबि।= हम ही साहब से गाली सुनते हैं

हमनी के दुःख भगवानओ ने देख ताजे,=भगवानो ने भी हम को दुःख दीया

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।=हमारे ही घर में कलेश होता है

पादरी सहेब के कचहरी में जाइबजां,

बेधरम होके रंगरज बनी जाइबि।=

हाय राम ! धरम न छोड़ते बनत बाते

बेधरम होके कैसे मुहंवा देखाइबि।

खंभवा के फारि पहलाद के बचवले जां,

ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।

धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,

परगट होके तहां कपड़ा बढ़बले।

मरले रवनवां के पलले भभिखना के,

कानी अंगुरी पै धैके पथरा उठवले।

कहवां सुतल बाटे सुनत न बाटे अब,

डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले ।= डोम जान क्र हमें छूने से डरते हैं

हमनी के राति दिन मेहनत करीलेजां,

दुइगो रुपयवा दरमहा में पाइबि।

ठाकुर के सुखसेत घर में सुतल बानीं,

हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि। =ढाकुरो के खेत जोत कर खेती कर के कमाकर हम ही उनको हामी देते हैं

हाकिमे कै लसकरि उतरल बानीं,

जेत उहओं बेगरिया में पकरल जाइबि।

मुंह बान्हि ऐसन नोकरिया करत बानीं,

ई कुलि खबरि सरकार के सुनाइबि।=ये सारी खबर सरकार को दे दो

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,=बामन की तरह हम भीख नहीं मांगते

ठाकुरे के लेखे नहि लउरी चलाइबि।=ठाकुर की तरह नेतागिरी भी नहीं करते

सहुआ के लेखे नहि डांडी हम मारबजां,=साहूकार की तरह हम डंडी (CHEATING ) भी नहीं मारते


अहिरा के लेखे नहि गइया चोराइबि।=अहीर की तरह हम चोरी भी नहीं करते

भंटउ के लेखेन कवित्त हम जोरबजां,

पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।

अपने पसिनवां के पइसा कमाइबजां,=अपना पसीना बहा कर पैसा कमाते हैं

घर भर मिली जुली बांटि चोंटि खाइबि।=सारा परिवार MI

हड़वा मसुइया कै देहियां है हमनी कै,

ओकरै के देहियां बभनओं कै बानी।

ओकरा के घरै-घरै पुजवा होखत बाजे,

सगरै इलकवा भइलैं जजमानी।

हमनी के इनरा के निगिचे न जाइलेजां,

पांके में से भरि भरि पियतानी पानी।

( ‘सरस्वती’ के सितम्बर,1914 में प्रकाशित)

1 comment:

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